
jindgi bahut gahri khai ke saman he. jisme ham ulajte hi jaate he. lakin umang honi chaheye kuch karne ki kuch banane ki.umang hame jindgi jina sikhata he.
Saturday, 17 January 2009
विचार...........

Monday, 12 January 2009
मंगलमय मकर सक्रांति ,लोहरी , और पोंगल...............

Sunday, 11 January 2009
आज का लेख स्वामी विवेकानंद जी के नाम .........

जहाँ एक ओर सर्व धर्म समभाव के प्रतीक थे वाही , आप में , अपने हिन्दू होने का गर्व भी था।
Saturday, 10 January 2009
फूल , तितली और ये सुनहरी धूप ..........

इस सुहानी धूप में.................
आज तितली अलग ही नजर आ रही ,
मन मनो कह रहा हें ...........
आज मै इस गगन में झूम - झूम नाचू ,
इधर जाउ उधर जाऊ ............
इस फूल जाऊ उस फूल जाऊ ,
aaj इस प्रकृति की गोद में आकर बैठ जाऊ ,
और सबको अपना गीत सुनाऊ..........
और ये फूल इतना सुंदर हें मानो.............
इश्वर ने इसे बड़ी फुर्सत से बनाया हो............
जिसमे चार चाँद और लग जाते जब.............
जब इस सुनहरी धूप में , मै इन फूलो पर बैठ जाती हू...........
और अपनी बाहों को फेलाकर जब नाचती हू.........
और इस फूल की सुगंध लेकर इस ............
जहा मै मदहोश हो जाऊ...............
Friday, 9 January 2009
झील में रवि...............

Thursday, 8 January 2009
ढूंढे तुझे ............
Wednesday, 7 January 2009
बाबुल तेरा अंगना ............. छूटे ना ..............
बाबुल का घर छोड, जाना हें पिया के घर...........
मेरे सपनो का घर ,
जिस घर में रहना हें, सारी उमर,
जहा नए- रिश्ते ,नाते बनते ,
जहा हर कोई लगे नया ,अपना सा कोई,
जिनके साथ हें रहना , वो लगे सारे अब अपने,
जिस घर में बचपन से रहे , अब वो घर लगे बेगाना सा,
बाबुल का घर छोड, जाना हें पिया के घर...........
अब नये सिरे से जिन्दगी बितानी हें,
जहा सब हें लेकिन लगता अब भी सुना हें ,
माँ तेरे हाथो का खाना , पापा प्यार भरी थपकी........
याद आते हें वो दिन ,
लेकिन बाबुल , अब तेरा घर आंगन छोड़ .............
मुझे नई दुनिया बसानी हें ,
जहा हर कोई लगे नया ,अपना सा कोई................
बाबुल का घर छोड, जाना हें पिया के घर...........
Tuesday, 6 January 2009
पापा की परी...........माँ की लाडो.............
मै भगवान् की सुकरगुजार हू , की उन्होंने इतने प्यारे माँ पापा की बेटी बनाकर भेजा हे इस प्यारी सी दुनिया मे तीन भाई की लाडली बहन हरदम उचल्कुद करने वाली। और भाई की माँ पापा से डाट पिटवाने वाली एक नटखट सी। याद आता हे वो दिन जब पहली बार साइकिल चलाते हुए घिर गई और इतनी सी चोट मे पापा ने भाई को जोर से डाट लगायी । तुम तो बड़े हो इसे साइकिल क्यों चलने दी अभी तो यह इतनी छोटी हे। मे आज भी पापा के लिए कभी बड़ी नही हुई । आज भी थोड़ा सा कुछ होते ही पापा घबरा जाते हे। वो बचपन के दिन, दिन भर मस्ती करते चाये धुप हो या बारिश , सर्दी के ठिठुरन भरे दिन हो..................... हर दम वही मस्ती , वही नाचना , गाना सहलिया के साथ गपशप लगानी । दिन ऐसा निकल जाता कुछ पता नही चलता। और सर्दी के ठिठुरन भरे दिनों मे माँ अलाव लगा देती तो बस.................. वही बेठ जाते। फ़िर क्या माँ के हाथो का घरम खाना ...........और पापा का अपने हाथो से खिलाना । कहना खाते खाते भाई की चुगली पापा से करना और फ़िर भाई को डाट पड़ती तो उसके मजे लेना । क्या दिन थे वो भी..............
हर दिन मे कुछ बात थी और , और हर बात मे कुछ खास अंदाज था ..............
हर दिन की सुबह भाई की चुगली से होती और पापा उसे दाटते तो उसके मजे लेना । और माँ की लाडली बेटी तो हू ही तो बस ...............यह बचपन के दिन............लेकिन अब बस इन दिनों की यादे हें।
अब तो इतने व्यस्त हो गए हें की, जिन्दगी के नए रस्ते खोजने मे ।
माँ पापा की चाव मे ये बचपन कैसे निकल गया पता ही नही चला लेकिन अभी तो तो bhut चलना हें। और वैस भी जिन्दगी रुकने का नाम नही ...........................
चलते रहो अभी आपको बहुत उचे मुकाम पर जाना हें , बस माँ पापा का आशीर्वाद सदा मेरे साथ रहे ................
Monday, 5 January 2009
दिल की बात.............
Sunday, 4 January 2009
उमंग.............
हम जानते हें की हर आदमी सिर्फ़ पैसे के पीछे भाग रहा हें।
लेकिन उसे सुकून नही मिल रहा हें चाहे कितना ही पैसा कमा ले लेकिन फ़िर भी उसे कम लगता हें ।
एसा इस लिए की उसे सिर्फ़ पैसा कमाना की उमंग हें जीने की नही।
लेकिन उमंग जीने की हो।